सोमवार, 20 जुलाई 2009

हम अपने दिल को समझाते रहते हैं

हम अपने दिल को समझाते रहते हैं
सावन-भादो आते जाते रहते हैं

प्यार के पंछी कब रुकते हैं उड़ने से
दुनिया वाले शौर मचाते रहते हैं

महफिल-महफिल हंसते हैं मुस्काते हैं
तन्हाई में अश्क़ बहाते रहते हैं

चाँद, हवा, फूल, किताबें, जुगनू, तितली
मिल कर मेरा जी बहलाते रहते हैं

बादल, चिड़िया, तोता, दरिया और 'परवाज़'
अपना-अपना दर्द सुनते रहते हैं

3 टिप्‍पणियां:

  1. चाँद, हवा, फूल, किताबें, जुगनू, तितली
    मिल कर मेरा जी बहलाते रहते हैं

    आपकी ग़ज़लों की परवाज़ बहूत ऊंची है........... हर शेर लाजवाब है

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jatinderparwaaz@gmail.com