रविवार, 5 जुलाई 2009

आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं

आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं

गुमसुम तन्हा क्यों बेठे हो सब पूछें
इतना भी संज़ीदा होना ठीक नहीं

कुछ और सोच ज़रीया उस को पाने का
जंतर-मंत्र जादू-टोना ठीक नहीं

अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं

मुस्तकबिल के ख्वाबों की भी फ़िक्र करो
यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं

दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
हीरे-मोती चांदी-सोना ठीक नहीं

कब तक दिल पर बोझ उठायोगे 'परवाज़'
माज़ी के ज़ख्मों को ढोना ठीक नहीं

9 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ और सोच ज़रीया उस को पाने का
    जंतर-मंत्र जादू-टोना ठीक नहीं
    वाह परवाज साहेब वाह...लाजवाब ग़ज़ल कही है...
    नीरज

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  2. बहुत ही सरलता से दिलासा दिलाते हो ....भाई..........बहुत खुब

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  3. कब तक दिल पर बोझ उठायोगे 'परवाज़'
    माज़ी के ज़ख्मों को ढोना ठीक नहीं

    वाह परवाज़ साहब..........कमल के शेर कहें हैं आपने.............मज़ा आ गया ग़ज़ल पढ़ कर . बहुत खूब

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  4. दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
    हीरे-मोती चांदी-सोना ठीक नहीं ।
    बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां, हर शब्‍द दिल की बात बोलते हुये, बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये बधाई ।

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  5. आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
    छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं
    सुन्दर गज़ल -- हर शेर मुकम्मल

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  6. कब तक दिल पर बोझ उठायोगे 'परवाज़'
    माज़ी के ज़ख्मों को ढोना ठीक नहीं
    लाजवाब गज़ल के लिये बधाई

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  7. अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
    सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं

    -बहुत खूब!! वाह!

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  8. मुस्तकबिल के ख्वाबों की भी फ़िक्र करो
    यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं

    दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
    हीरे-मोती चांदी-सोना ठीक नहीं

    वाह ... वाह बहुत खूब !
    आपकी रचना पठनीय है !

    शुभकामनाएं !

    आज की आवाज

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jatinderparwaaz@gmail.com