शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ

// ग़ज़ल //

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ
मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ

फूल से जिस्म चाँद से चेहरे
तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ

तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी
हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ

ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता
था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ

शाम तक तो नगर सलामत था
हो गया रात भर में क्या क्या कुछ

हम से पूछो न जिंदगी 'परवाज़'
थी हमारी नज़र में क्या क्या कुछ

जतिन्दर परवाज़

7 टिप्‍पणियां:

  1. तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी
    हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ

    वाह क्या खूबसूरत शेर कहा है आपने...और लाजवाब ग़ज़ल है आपकी...
    नीरज

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  2. एक और खूबसूरत ग़ज़ल............
    उम्दा जनाब

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  3. ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ
    मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ

    -bahut hi sundar gazal hai .

    aap ke blog par pahli baar ana hua hai.
    dheere dheere aap ki dusri gazalen padhengey.

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jatinderparwaaz@gmail.com