शनिवार, 14 मार्च 2009

ग़ज़ल

शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुबने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

सभी के खून में गैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है

जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है

चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

तशनगी - प्यास

5 टिप्‍पणियां:

  1. नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
    समन्दर बारिशों में भीगता है

    वाह...जवाब नहीं इस शेर का...कमाल कर दिया है आपने...बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है...बधाई...
    नीरज

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  2. कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
    मेरा बचपन अभी तक भागता है

    सभी के खून में गैरत नही पर
    लहू सब की रगों में दोड़ता है

    बहुत umda gazal, हर sher lajawaab. ये दोनों तो ख़ास कर.........

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  3. जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
    मेरी आँखों में आँखे डालता है
    खूबसूरत अदायगी -बधाई
    आज किसी ब्लॉग से पता मिला भाई
    श्याम सखा मेरे ब्लॉग्स
    http://gazalkbahane.blogspot.com/ कम से कम दो गज़ल [ हर सप्ताह
    http:/katha-kavita.blogspot.com/ दो छंद मुक्त कविता हर सप्ताह कभी-कभी लघु-कथा या कथा का छौंक भी मिलेगा
    सस्नेह
    श्यामसखा‘श्याम

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jatinderparwaaz@gmail.com